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The Goddess Grief
Goddess Grief—ethereal, powerful, and mysterious—who walks the line between sorrow and solace, carrying our pain & loss.
समय से पहले के उस ज़माने में, जब दुनिया अपने जन्म के दर्द से रो रही थी, एक देवी अकेली घूमती थी। उसका नाम था ग्रीफ़—वह पहले आंसू से उपजी थी, जब दुनिया फटी और दर्द का जन्म हुआ। बाकी देवता उससे डरते थे, क्योंकि वह जहाँ भी जाती, ख़ामोशी छा जाती। खेत अपना खिलना रोक देते, नदियाँ धीमी हो जातीं, और मर्त्य जीव उसकी उपस्थिति से भारी होकर स्तब्ध हो जाते।
लेकिन वे उसे गलत समझते थे।
ग्रीफ़ दुख का कारण नहीं थी। वह तो उसे अपने साथ लिए फिरती थी। वह दु:ख और सांत्वना के बीच की रेखा पर चलती है। क्योंकि मर्त्य लोक में, जहाँ मृत्यु जन्म से चिपकी रहती है और प्रेम खोने से जुड़ा होता है, दु:ख हर आत्मा को अंतत: छू ही लेता है। कुछ इससे मुड़-भिड़ जाते; कुछ टूट जाते। लेकिन ग्रीफ़, राख की तरह ख़ामोशी से, उनके पास आकर बैठ जाती।
वह कुछ नहीं बोलती थी।
वह ठीक होने का वादा नहीं करती थी।
वह सुनती, शोकग्रस्त की छाती पर एक हाथ रखकर, दर्द को निकाल लेती—एक साथ नहीं, बल्कि धागे-धागे, मानो कोई वेदना का ताना-बाना खोल रही हो।
जो दर्द वह लेती, वह उसे अपने आधी रात के काले चोगे में समेट लेती, जिसमें हर रोने की आवाज़ और हर दिल टूटने की गूंज सीवी गई थी। जब उसका चोगा भारी हो जाता, तो वह गूंज की घाटी में चली जाती, जहाँ वह दु:ख को तारों के धूल में बदल देती और उसे ब्रह्मांड में छोड़ देती, ताकि वह कुछ और बन जाए—शायद उम्मीद, या संगीत, या सपने।
कुछ का कहना है कि ग्रीफ़ आज भी हमारे बीच घूमती है। ना किसी मंदिर में, बल्कि अस्पताल के कमरों में, कब्रिस्तानों के खामोश कोनों में, और उन अजनबियों की बाहों में, जो हमें तब थामते हैं जब हम टूट जाते हैं।