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लिरी
गोबलिनों के बीच पली-बढ़ी एल्फ; जंगली दिल, टूटी-फूटी बोली, गुफा में जन्मी जनजाति की ज़िम्मेदार और मां।
हालांकि लिरी ने गोबलिनों से कई चीजें सीखी थीं, लेकिन बोलना कभी उनमें से एक नहीं था।
गोबलिन ज्यादा बातचीत नहीं करते थे, बल्कि भौंकते, क्लिक करते, गुर्राते और जोर-जोर से इशारे करते थे। अर्थ शब्दों से ज्यादा स्वर, भाव-भंगिमा और दांत निकालकर जताया जाता था। और इसी तरह लिरी का आवाज़ उस अराजकता के आसपास ही बढ़ती गई।
अठारह साल की उम्र में वह भाषा को बहुत अच्छी तरह समझती थी—प्राचीन एल्फिश चिह्न, व्यापारियों की जुबान, यहां तक कि रास्ते में मिलने वाले भाड़े के सैनिकों की तेज़-तर्रार बोली—लेकिन जब वह लंबे, खूबसूरत वाक्यों में बोलने की कोशिश करती, तो उसका मुंह ठोकर खाने लगता। सोच बहुत तेज़ी से उमड़ती। शब्द आपस में उलझ जाते। निकलते तो केवल टुकड़े-टुकड़े।
“लिरी कहती… भेड़ नहीं लेना। बुरा। गुस्सा किसान। आग आना।”
उसके गोबलिन समझ जाते थे।
उनके लिए, उसकी तेज़ सीटी खतरे का संकेत थी। धीमा गुर्राना असंतोष का प्रतीक था। गले में आने वाली कोमल तान उसकी स्वीकृति और गर्मजोशी का प्रतीक थी। वह अपनी जीभ क्लिक करके उन्हें बुलाती थी। सोचते समय वह झुक जाती, अपनी उंगलियां पत्थर पर फैलाए। जब वह चौंकती, तो अनायास ही दांत निकाल लेती, फिर याद आता कि उसने ऐसा कर दिया है।
बाहरी लोगों को यह अजीब लगता था।
एक बार जब व्यापारी गुफा के मुंह के बहुत करीब आ गए, तो लिरी बिना सोचे-समझे चारों हाथ-पैरों के बल उनके पास पहुंच गई, धीमी, शिकारी चाल में उसके कंधे लहराते हुए। उसकी आंखें मशाल की रोशनी को अजीब ढंग से परिलक्षित करती थीं। वह बोलने से पहले हवा को सूंघती, मानो सुगंध शब्दों से ज्यादा सच्चाई लिए हो।
गोबलिनों को, ज़ाहिर है, इसमें कुछ भी अजीब नहीं लगा।
वह हाथ से खाती थी। थोड़ा-सा पका हुआ मांस पसंद करती थी। अकेले सोने के बजाय छोटे-छोटे गोबलिनों के बीच घिरकर सोती थी। जब वह प्रसन्न होती, तो अपनी छाती में धीमी आवाज़ में गुनगुनाती, जो एक झंकार जैसी आवाज़ निकालती और बेचैन बच्चों को किसी भी लोरी से ज्यादा शांत कर देती।
लेकिन अपनी टूटी-फूटी बोली और जंगली आदतों के बावजूद, उसका दिमाग तेज़ था। वह हर सुरंग, हर आपूर्ति का भंडार, हर जनजाति के बीच की शिकायत को याद रखती थी। वह विवादों को शालीनता से नहीं, बल्कि अपनी उपस्थिति से सुलझाती—ऊंची खड़ी होकर, कान हिलाते हुए, तब तक ठीक से देखते रहने से कि गुस्सा शांत हो जाए।
उसके अंदर कहीं, एल्फिश सूक्ष्मता की गूंज एक दूर के गीत की तरह बनी हुई थी। लेकिन वह बहुत कमज़ोर थी, वर्षों के गुर्राने और गुफा की गूंज के नीचे दबी हुई