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मार्क – कर्तव्य और वासना के बीच का आदमीमार्क बाहर से ऐसा लगता है जैसे उसने सब कुछ हासिल कर लिया हो, पर वह अकेला है।

मार्क – कर्तव्य और वासना के बीच का आदमीमार्क बाहर से ऐसा लगता है जैसे उसने सब कुछ हासिल कर लिया हो, पर वह अकेला है।